रास नहीं आती नेताओं को गाजियाबाद में हाथी की सवारी

 

चुनाव हारने के बाद बिगड़ जाती है बसपा उम्मीोदवारों  के सितारों की चाल 
बसपा से चुनाव लड़े तीन ब्राह्मण नेताओं को तो विभिन्नि मामलों में जेल भी जाना पड़ा
अब इसे पनौती नहीं तो और क्यान कहेंगें


गाजियाबाद। सोलहवें संसदीय चुनाव की उल्टीं गिनती शुरू होते ही सियासी गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। जानकारों का दावा है कि गाजियाबाद में नेताओं को हाथी की सवारी रास नहीं आती। बेशक कुछ लोग इस तथ्या को शायद अंधविश्वािस करार देकर दरकिनार करना चाहें, लेकिन पिछले चुनावों के इतिहास पर नजर डालने के बाद आप भी इससे इंकार नहीं कर पाएंगे। बसपा के बैनर तले चुनाव लड़कर हारे तमाम नेताओं का ब्यौ‍रा खंगालने पर आपको इल्म  होगा कि हाथी पर बैठकर सदन में पहुंचने का ख्बा ब इन्हेंध किस कदर महंगा साबित हुआ। आलम यहां तक रहा कि बसपा से चुनाव लड़े तीन ब्राह्मण नेताओं को तो विभिन्नल मामलों में जेल भी जाना पड़ा।
अब जेल जाने वालों की फेहरिश्तत पर जरा नजर दौड़ाएं तो इसमें सबसे पहला नाम आता है वर्ष 2000 में बसपा के बैनर तले गाजियाबाद से मेयर का चुनाव लड़े रवि दत्त शर्मा उर्फ आरडी शर्मा का। आरडी सियासत में आने से पहले जिले में बैंकिंग जगत की कद्दावर शख्सियत थे, बसपा का झण्डाा थाम कर महापौर का चुनाव क्याज लड़ा गाजियाबाद अर्बन कोऑपरेटिव बैंक तो डूबा ही, करोड़ों रुपए के घोटाले में जेल का सफर करना पड़ा सो अलग। कुल मिला कर बसपा के हाथी की सवारी आरडी शर्मा को बेहद महंगी पड़ी और चुनाव में करोड़ों रुपए की चपत के साथ ही जेल की हवा भी खानी पड़ी।
बसपा के हाथी पर सवार होकर अपने सितारों की चाल बिगड़ाने वालों में दूसरा नाम है जनार्दन शर्मा उर्फ जेडी शर्मा का। वर्ष 2002 में बसपा के टिकट पर गाजियाबाद विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े जेडी सियासत में आने से पहले ठेकेदारी की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हुआ करते थे। चुनाव क्याा लड़ा मानो किस्मेत ही जनार्दन से रुठ गई। कहां तो सियासत में पदार्पण किया था रुतबा बुलंदी की खातिर और कहां जारी के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी। रुतबा तो खैर क्याक बुलंद होता, रही-सही इज्जमत भी मिट्टी में मिल गई  और कलंक भी ऐसा लगा कि छुपाए न छिपे मिटाए न मिटे।
इस फेहरिश्त  में तीसरा नाम है 2004 में हुए उप चुनाव में हाथी पर सवार होकर विधान सभा पहुंचने को मैदान में उतरे बाहुबली मुनीश शर्मा उर्फ पप्पूु पंडित का। लाखों खर्च हुए, लेकिन विजयश्री नहीं मिली। हालात ऐसे बने कि सियासत में किस्मेत चमकने के बजाए न सिर्फ जेल जाना पड़ा, बल्कि एक दिन जहरीला पदार्थ खाने के चलते कई दिन तक जिंदगी और मौत के बीच झूलना पड़ा सो अलग। अब कमोबेश गुमनाम सा जीवन जी रहे हैं।
इसके अलावा कई नाम ऐसे हैं जिन्होंमने कभी न कभी बसपा के वोट बैंक के जरिए अपनी राजनीतिक महत्वाबकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास किया, लेकिन सियासी आसमान में चमकने के बजाए गुमनामी के अधेंरे में खो गए।
इनमें एक नाम है वर्ष 1996 में बसपा से विधान सभा चुनाव लड़े गुरविंदर सिंह उर्फ लकी छतवाल का। गुरविंदर ने चुनाव से ऐन पहले लोकमंच के बैनर तले अच्छीर-खासी भीड़ जुटा कर कई बेहतरीन वादों और संकल्पं के साथ सियासी सफर शुरू किया, लेकिन चुनाव क्याछ हारे न तो वादे व संकल्पन बचे और न ही बचा लोकमंच। अब सियासत छोड़ शराब और शिक्षा के कारोबार में सिमटे बैठे हैं। शराब और शिक्षा के कारोबार पैसा बेशक खूब हो, लेकिन सियासत जैसी रुतबा बुलंदी यहां कहां।
ग्यांरहवी लोकसभा के लिए वर्ष 1996 में हुए संसदीय चुनाव में यहां बसपा के बैनर तले पूर्व सांसद अनवार अहमद ने ताल ठौंकी थी। इस चुनाव में 126194 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे अनवार अहमद पंद्रहवीं लोकसभा के लिए एक गुमनाम दल नवभारत निर्माण पार्टी से चुनाव लड़े और उनकी ऐसी फजीहत हुई कि वर्ष 1980 में यहां का संसद में प्रतिनिधित्वप कर चुके अनवार अहमद को महज 910 वोट ही मिले।
बारहवीं लोकसभा के लिए 1998 में 156595 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे बसपा के उम्मीहदवार रहे मौहम्मकद उमर और वर्ष 1999 तेरहवें संसदीय चुनावों में 193221 मत हासिल करके बसपा का झण्डाी बुलंद करने वाले खालिद चौधरी सियासी जगत में कहां हैं कोई नहीं जानता।
चौदहवीं लोकसभा के लिए वर्ष 2004 में हुए चुनाव में 180068 वोट के साथ तीसरे
पायदान पर रहने वाले बसपा के उम्मीेदवार रहे कुवंर अय्यूब अली फिलहाल रालोद में गुमनामी काट रहे हैं। कुल मिलाकर जिस किसी ने भी बसपा के हाथी की सवारी की उन्हेंक ऐसी पटकी लगी कि या तो वे राजनीतिक परिदृश्य  से ही गायब हो गए या फिर किसी न किसी वजह से दामन को दागदार करके बदनाम हो कर जेल पहुंच गए। अब इसे बसपा की पनौती नहीं तो और क्याह कहेंगें।
हां गाजियाबाद से मेयर का चुनाव लड़े जलालुद्दीन सिद्दीकी और वर्ष 2009 में गाजियाबाद संसदीय क्षेत्र से बसपा उम्मीिदवार रहे और अब साहिबाबाद के विधायक अमरपाल शर्मा इस मामले में जरूर अपवाद कहे जा सकते हैं।